HKS 33. Phalastuti Sandhi (Karjagi Shri Vitthala Daasa)

हरि सर्वोत्तम । वायु जीवोत्तम । श्री गुरुभ्यो नमः ।

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३३. फलस्तुति सन्धि (कर्जगि श्रीदविठलदास विरचित)

हरिक-थामृत — सार-गुरुगळ ।

करुण-दिंदा — पनितु-पेळुवॆ ।

परम-भगवद् — भक्त-रिदना — दरदि-केळुवु-दु ॥ प ॥

हरिक-थामृत — सार- श्रीम ।

द्गुरुव-र जग — न्नाथ- दासर ।

करत-लामल — कवॆनॆ- पेळिद — सकल- सन्धिग-ळ ॥ परम- पंडित — मानि-गळु म- ।

त्सरिस-लॆदॆगि — च्चागि- तोरुवु ।

दरसि-करिगिदु — तोरि- पेळुवु — दल्ल- धरॆयॊळ-गॆ ॥ ३३-१ ॥

भामि-निय ष — ट्पदिय- रूपद ।

ली म-हाद्भुत — काव्य-दादियॊ ।

ळा म-नोहर — तर त-मात्मक — नांदि-पद्यग-ळ ॥ याम- यामकॆ — पठिसु-ववर सु- ।

धाम-सख कै — पिडिय-लोसुग ।

प्रेम-दिंदलि — पेळ्द- गुरुका — रुण्य-केनॆं-बॆ ॥ ३३-२ ॥

सार-वॆंदरॆ — हरिक-थामृत ।

सार-वॆंबुवु — दॆम्म- गुरुवर ।

सारि-दल्लदॆ — तिळिय-दॆनुत म — हेंद्र- नंदन-न ॥ सार-थिय बल — गॊंडु- सारा ।

सार-गळ नि — र्णयिसि- पेळ्दनु ।

सार- नडॆव म — हात्म-रिगॆ सं — सार-वॆल्लिहु-दॊ ॥ ३३-३ ॥

दास-वर्यर — मुखदि- निंदु र- ।

मेश-ननु की — र्तिसुव- मनदभि ।

लाषॆ-यलि व — र्णाभि-मानिग — ळॊलिदु- पेळिसि-द ॥

ई सु-लक्षण — काव्य-दॊळु यति ।

प्रास-गळिगॆ प्र — यत्न-विल्लदॆ ।

लेसु- लेसॆनॆ — श्राव्य- मादुदॆ — कुरुहु- कविगळि-गॆ ॥ ३३-४ ॥

प्राकृ-तोक्तिग — ळॆंदु- बरिदॆ म- ।

हाकृ-तघ्नरु — जरिव-रल्लदॆ ।

स्वीकृ-तव मा — डदलॆ- बिडुवरॆ — सुजन-रादव-रु ॥ श्रीकृ-तीपति — यमल- गुणगळु ।

ई कृ-तियॊळुं — टाद- बळिकिदु ।

प्राकृ-तवॆ सं — स्कृतद- सडगर — वेनु- सुगुणरि-गॆ ॥ ३३-५ ॥

श्रुतिगॆ- शोभन — वाग-दॊडॆ जड ।

मतिगॆ- मंगळ — वीय-दॊडॆ शृति ।

स्मृतिगॆ- सम्मत — विल्ल-दिद्दॊडॆ — नम्म- गुरुरा-या ॥ मथिसि- मध्वा — गमप-योब्धिय ।

क्षितिगॆ- तोरिद — ब्रह्म- विद्या ।

रतरि-गीप्सित — हरिक-थामृत — सार-वॆनिसुव-दे ॥ ३३-६ ॥

भक्ति-वाददि — पेळ्द-नॆंब प्र ।

सक्ति- सल्लदु — काव्य-दॊळु पुन ।

रुक्ति- शुष्क स — मास- पद व्य — त्यास- मॊदला-द ॥

युक्ति- शास्त्र वि — रुद्ध- शब्दवि ।

भक्ति- विषमग — ळिरलु- जीव ।

न्मुक्ति- योग्यवि — दॆंदु- श्रीमद — नंत- मॆच्चुव-नॆ ॥ ३३-७ ॥

आशु- कविकुल — कल्प-तरु दि ।

ग्देश-वरियलु — रंग-नॊलुमॆय ।

दास-कूट — स्थरिगॆ-रगि ना — बेडि-कॊंबुवॆ-नु ॥

ई सु-लक्षण — हरिक-थामृत ।

मीस-लळियदॆ — सार- दीर्घ ।

द्वेषि-गळिगरि — सदलॆ- सलिसुवु — दॆन्न- भिन्नप-व ॥ ३३-८ ॥

प्रास-गळ पॊं — दिसदॆ- शब्द ।

श्लेष-गळ शो — धिसदॆ- दीर्घ ।

ह्रास-गळ स — ल्लिसदॆ- षट्पदि — गतिगॆ- निल्लिस-दॆ ॥ दूष-करु दिन — दिनदि- माडुव ।

दूष-णवॆ भू — षणवु- ऎंदुप ।

देश- गम्यवु — हरिक-थामृत — सार- साध्यरि-गॆ ॥ ३३-९ ॥

अश्रु-तागम — इदर- भाव प ।

रिश्र-मव ब — ल्लवरि-गानं ।

दाश्रु-गळ मळॆ — गरिसि- मैमरॆ — सुव च-मत्कृति-य ॥ मिश्र-रिगॆ मरॆ — माडि- दिविजर ।

जस्र-दलि का –य्दिप्प-रिदरॊळु ।

पश्रु-तिगळिरॆ — तप्पु- ववॆ निज — भक्ति-युक्तरि-गॆ ॥ ३३-१० ॥

निच्च- निजजन — नॆच्चि नॆलॆगॊं- ।

डच्च- भाग्यवु — पॆच्चॆ- पेर्मॆयु ।

कॆच्च- केळ्मन — मॆच्चि- मलॆवर — मुच्च-लॆंदॆनु-त ॥ उच्च-विगळिगॆ — पॊच्च- पॊसदॆन ।

उच्च-रिसिदी — सच्च-रित्रॆय ।

नुच्च-रिसॆ सिरि — वत्स- लांछन — मॆच्च-लेनरि-दु ॥ ३३-११ ॥

साधु- सभॆयॊळु — मॆरॆयॆ- तत्व सु ।

बोध- वृष्टिय — गरॆयॆ- काम ।

क्रोध- बीजवु — हुरियॆ- खळरॆदॆ — बिरियॆ- करकरि-य ॥ वादि-गळ प — ल्मुरियॆ- परम वि- ।

नोदि-गळ मै — मरॆय-लोसुग ।

हादि-तोरिद — हिरिय- बहुचा — तुर्य- हॊसपरि-य ॥ ३३-१२ ॥

व्यास- तीर्थर — ऒलवॊ विठलो- ।

पास-क प्रभु — वर पु-रंदर ।

दास-रायर — दयवॊ- तिळियदु — ओदि- केळद-लॆ ॥

केश-वन गुण — मणिग-ळनु प्रा- ।

णेश-गर्पिसि — वादि-राजर ।

कोश-कॊप्पुव — हरिक-थामृत — सार- पेळिद-रु ॥ ३३-१३ ॥

हरिक-थामृत — सार- नवरस ।

भरित- बहुगं — भीर-रत्ना ।

कररु-चिर शृं — गार- सालं — कार- विस्ता-र ॥

सरस- नर कं — ठीर-वाचा ।

र्यरज-नित सुकु — मार- सात्वी ।

करिगॆ- परमो — दार- माडिद — मरॆय-दुपका-र ॥ ३३-१४ ॥

अवनि-योळु जो — तिष्म-तिय तै- ।

लवनु- पामर — नुंडु- जीर्णिस ।

लवनॆ- पंडित — नोक-रिसलवि — वेकि-यप्पं-तॆ ॥ श्रवण- मंगळ — हरिक-थामृत- ।

सविदु- निर्गुण — सार- मक्किस- ।

लव नि-पुणनै — योग्य-गल्लदॆ — दक्क-लरियदि-दु ॥ ३३-१५ ॥

अक्क-रदॊळी — काव्य-दॊळु ऒं- ।

दक्क-रव बरॆ — दोदि-दव दे- ।

वर्क्क-ळिगॆ दु — स्त्यजनॆ-निसि ध — र्मार्थ- कामग-ळ ॥ लॆक्कि-सदॆ लो — कैक-नाथन ।

भक्ति-भाग्यव — पडॆव- जीव ।

न्मुक्त-गल्लदॆ — हरिक-थामृत — सार- सॊगसुव-दॆ ॥ ३३-१६ ॥

ऒत्ति-बह वि — घ्नगळ- तडॆदप- ।

मृत्यु-विगॆ मरॆ — माडि- कालन ।

भृत्य-रिगॆ भी — करव- पुट्टिसि — सकल- सिद्धिग-ळ ॥ पूर्ति-गॊळ्ळिसि — वनरु-हेक्षण ।

नृत्य-माडुव — नवर- मनॆयॊळु ।

नित्य- मंगळ — हरिक-थामृत — सार- पठिसुव-र ॥ ३३-१७ ॥

आयु-रारो — ग्यैश्व-रिय यश ।

धैर्य-बल वि — ज्ञान- शौर्यौ ।

दार्य- गुणगां — भीर्य- चातु — र्यगळॆ- मॊदला-द ॥ आय-तगळुं — टाग-लॊंद ।

ध्याय- पठिसिद — मात्र-दिं श्रव- ।

णीय-वल्लवॆ — हरिक-थामृत — सार- सुजनरि-गॆ ॥ ३३-१८ ॥

कुरुड- कंगळ — पडॆव- बधिरनि- ।

गॆरडु- किवि के — ळ्बहवु- बॆळॆयद ।

मुरुड- मदना — कृतिय- ताळ्वनु — केळ्द- मात्रद-लि ॥ बरडु- हैना — गुवुदु- केळ्दरॆ ।

कॊरडु- पल्लवि — सुवुदु- प्रतिदिन ।

हुरुडि-लादरु — हरिक-थामृत — सार-वनु पठि-सॆ ॥ ३३-१९ ॥

निर्ज-र तरं — गिणियॊ-ळनुदिन ।

मज्ज-नादि स — मस्त- कर्म वि- ।

वर्जि-ताशा — पाश-दिंदलि — माडि-दधिकफ-ल ॥

हॆज्जॆ- हॆज्जॆगॆ — दॊरॆय-दिप्पवॆ ।

सज्ज-नरु शिर — दूगु-वंददि ।

घर्जि-सुतली — हरिक-थामृत — सार- पठिसुव-र ॥ ३३-२० ॥

सतिय-रिगॆ पति — भकुति- पत्नी- ।

व्रत पु-रुषरिगॆ — हरुष- नॆलॆगॊं- ।

डति म-नोहर — रागि- गुरुहिरि — यरिगॆ- जगदॊळ-गॆ ॥

सतत- मंगळ — वीयु-व बहु सु- ।

कृतग-ळॆनिसुत — सुलभ-दिं स- ।

द्गतिय- पडॆवरु — हरिक-थामृत — सार-वनु पठि-सॆ ॥ ३३-२१ ॥

ऎंतु- बण्णिस — लॆन्न-ळवॆ भग- ।

वंत-नमल गु — णानु-वादग ।

ळॆंतु- परियलि — पूर्ण-बोधर — मतव- पॊंदिद-र ॥ चिंत-नॆगॆ ब — प्पंतॆ- बहु दृ- ।

ष्टांत- पूर्वक — वागि- पेळ्द म- ।

हंत-रिगॆ नर — रॆंदु- बगॆवरॆ — निरय- भागिग-ळु ॥ ३३-२२ ॥

मणि ख-चित हरि — वाण-दलि वा- ।

रण सु-भोज्य प — दार्थ- कृष्णा- ।

र्पणवॆ-नुत पसि — दवरि-गोसुग — नीडु-वंदद-लि ॥ प्रणत-रिगॆ पॊं — गनड-वरवा- ।

ङ्मणिग-ळिं विर — चिसिद- कृतियॊळु ।

उणिसि- नोडुव — हरिक-थामृत — सार- वनुदा-र ॥ ३३-२३ ॥

दुष्ट-रॆन्नदॆ — दुर्वि-षयदिं ।

पुष्ट-रॆन्नदॆ — पूत-कर्म ।

भ्रष्ट-रॆन्नदॆ — श्रीद-विठ्ठल — वेणु-गोपा-ल ॥ कृष्ण- कैपिडि — वनु सु-सत्य वि- ।

शिष्ट- दास — त्ववनु- पालिसि ।

निष्ठॆ-यिंदलि — हरिक-थामृत — सार- पठिसुव-र ॥ ३३-२४ ॥

॥ इति श्री कर्जगि श्रीदविठलदास विरचित फलस्तुति सन्धि संपूर्णं ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

Original content reused with permission from Tadipatri Gurukula

॥ भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥