HKS 16. Datta Svaatantrya (Vibhajana) Sandhi

हरि सर्वोत्तम । वायु जीवोत्तम । श्री गुरुभ्यो नमः ।

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श्री जगन्नाथदासार्य विरचित श्री हरिकथाम्रुतसर

१६. दत्त स्वातंत्र्य (विभजन) सन्धि

हरिक-थामृत — सार-गुरुगळ ।

करुण-दिंदा — पनितु-पेळुवॆ ।

परम-भगवद् — भक्त-रिदना — दरदि-केळुवु-दु ॥ प ॥

कारु-णिक हरि — तन्नॊ-ळिप्पा ।

पार- स्वातं — त्रिय गु-णदि ना ।

नूरु- तॆगॆदु स — पाद- आरॊं — दधिक- अरव-त्तु ॥

नारि-गित्त द्वि — षोड-शाधिक ।

नूरु- पाद — त्रयव- तन्न श- ।

रीर-दॊळगी — परि वि-भागव — माड्द- त्रिपदा-ह्व ॥ १६-१ ॥

सत्य-लोका — धिपनॊ-ळगॆ ऐ- ।

वत्तॆ-रडु पव — मान-नॊळु ना- ।

ल्वत्तु- मेलॆं — टधिक- शिवनॊळ — गिट्ट-निप्प-त्तु ॥ चित्त-जेंद्ररॊ — ळैद-धिक दश- ।

तत्त्व-मानिग — ळॆनिप- सुररॊळु ।

हत्तु- ईरै — दखिळ- जीवरॊ — ळिट्ट- निरव-द्य ॥ १६-२ ॥

कलि मॊ-दलुगॊं — डखिळ- दानव- ।

रॊळगॆ- नाल्व — त्तैदु- ई परि ।

तिळिदु-पासनॆ — माडु- मरॆयदॆ — परम- भकुतिय-लि ॥ इळॆयॊ-ळगॆ सं — चरिसु- लक्ष्मी- ।

निलय-नाळा — नॆंदु- सर्व- ।

स्थळग-ळलि सं — तैसु-तिप्पनु — गॆळॆय-नंदद-लि ॥ १६-३ ॥

अवनि-प स्वा — मित्व- धर्मव ।

स्ववश-मात्यरि — गित्तु- ता म- ।

त्तवर- मुखदलि — राज- कार्यव — माडि-सुव तॆर-दि ॥

कवि भि-रीडित — तन्न- कळॆगळ ।

दिविज- दानव — मान-वरॊळि- ।

ट्टविर-त गुण — त्रयज- कर्मव — माडि- माडिसु-व ॥ १६-४ ॥

पुण्य- पापग — ळी तॆ-रदि का- ।

रुण्य- सागर — देव- दानव- ।

मान-वरॊळि — ट्टवर- फल व्य — त्यास-वनॆ मा-डि ॥

बन्न- बडिसुव — भक्ति- हीनर ।

सन्नु-त सुक — र्म फल- तॆगॆदु प्र- ।

पन्न-रिगॆ कॊ — ट्टवर- सुखबडि — सुवनु- सुभुजा-ह्व ॥ १६-५ ॥

माणि-कव कॊं — डंग-डियॊळजि ।

वान- कॊट्टा — पुरुष-न समा- ।

धान- माडुव — तॆरदि- दैत्यरु — नित्य-दलि मा-ळ्प ॥

दान- यज्ञा — दिगळ- फल पव- ।

मान- पितनप — हरिसि- असमी- ।

चीन- सुखगळ — कॊट्टु- असुरर — मत्त-रनु मा-ळ्प ॥ १६-६ ॥

एण- लांछन — नमल- किरण क्र- ।

मेण- वृद्धिय — नैदि- लोगर ।

काण-गॊडदिह — कत्त-लॆय भं — गिसुव- तॆरदं-तॆ ॥ वैन-तेयां — सगन- मूर्ति- ।

ध्यान-वुळ्ळ म — हात्म-रिगॆ सु- ।

ज्ञान- भक्त्या — दिगळु- वर्धिसि — सुखव- कॊडुतिह-वु ॥ १६-७ ॥

जनप-नरिकॆय — चोर- पॊळलॊळु ।

धनव- कद्दॊ — य्दीय-लवनव- ।

गुणग-ळॆणिसदॆ — पॊरॆव- कॊडदिरॆ — शिक्षि-सुव तॆर-दि ॥ अनुचि-तोचित — कर्म- कृष्णा- ।

र्पणवॆ-नलु कै — कॊंडु- तन्नर- ।

मनॆयॊ-ळिट्टा — नंद- बडिसुव — माध-वानत-र ॥ १६-८ ॥

अन्न-दन्ना — दन्न- नामक ।

मुन्न- पेळ्द प्र — कार- जीवरॊ- ।

ळन्न- रूप प्र — वेश-गैदव — रवर- व्यापा-र ॥ बन्न- बडदलॆ — माडि- माडिसि ।

धन्य-रिवरहु — दॆंदॆ-निसि त्रै- ।

गुण्य- वर्जित — तत्त-दाह्वय — नागि- करॆसुव-नु ॥ १६-९ ॥

सलिल- बिंदु प — योब्धि-यॊळु बी- ।

ळलु वि-कारव — नैद- बल्लदॆ ।

जलवु- तद्रू — पवनॆ- ऐदुव — दॆल्ल- कालद-लि ॥

कलिम-लापह — नर्चि-सुव स- ।

त्कुलज-र कुक — र्मगळु- ता नि- ।

ष्कलुष- कर्मग — ळागि- पुरुषा — र्थगळ- कॊडुतिह-वु ॥ १६-१० ॥

मॊगदॊ-ळगॆ मॊग — विट्टु- मुद्दिसि ।

मगुवि-नं बिगि — दप्पि- नेहदि ।

तॆगॆदु- तन्न — स्तनग-ळुणिसुव — जननि-यंदद-लि ॥ अगणि-तात्मनु — तन्न- पादा- ।

ब्जगळ- धेनिप — भक्त- जनरिगॆ ।

प्रघट-कनु ता — नागि- सौख्यग — ळीव- सर्व-त्र ॥ १६-११ ॥

तोटि-गनु भू — मियॊळु- बीजव ।

नाट-बेकॆं — दॆनुत- हितदलि ।

मोटॆ-यिं नी — रॆत्ति- ससिगळ — संत-यिसुवं-तॆ ॥

पाटु- बडदलॆ — जगदि- जीवर ।

घोट-कास्यनु — सृजिसि- योग्यतॆ ।

दाट-गॊडदलॆ — सलहु-तिप्पनु — सर्व-कालद-लि ॥ १६-१२ ॥

भूमि-यॊळु जल — विरॆ तृ-षार्तनु ।

ता म-रॆदु मॊग — वॆत्ति- ऎण्दॆसॆ ।

व्योम- मंडल — दॊळगॆ- काणदॆ — मिडुकु-वंदद-लि ॥ श्रीम-नोरम — सर्व-रंत- ।

र्यामि-यागिरॆ — तिळिय-दनुदिन ।

भ्राम-करु भजि — सुवरु- भकुतिय — लन्य- देवतॆ-य ॥ १६-१३ ॥

मुख्य- फल वै — कुंठ- मुख्या- ।

मुख्य- फल मह — रादि- लोका- ।

मुख्य- फल वै — षयिक-वॆंदरि — दति भ-कुतियिं-द ॥ रक्क-सारिय — भजिसु-तलि नि- ।

र्दुःख-नागु नि — रंत-रदि मॊरॆ- ।

हॊक्क-वर बिड — भक्त- वत्सल — भार-तीश पि-त ॥ १६-१४ ॥

व्याधि-यिं पी — डित शि-शुविगॆ गु- ।

डोद-कव नॆरॆ — ददकॆ- औषध ।

तेदु- कुडिसुव — तायि-योपा — दियलि- सर्व-ज्ञ ॥ बाद-रायण — भक्त- जनकॆ प्र- ।

साद- रूपक — नागि- भागव- ।

तादि-यलि पे — ळिदनु- धर्मा — दिगळॆ- फलवॆं-दु ॥ १६-१५ ॥

दूर-दल्लिह — पर्व-त घना- ।

कार- तोर्पुदु — नोळ्प- जनरिगॆ ।

सार- गैय्यलु — सर्प- व्याघ्र — गळिंद- भयविहु-दु ॥ घोर-तर सं — सार- सौख्या- ।

सार- तरवॆं — दरितु- नित्य र- ।

मार-मणना — राधि-सुवरद — रिंद- बल्लव-रु ॥ १६-१६ ॥

कॆसर- घटगळ — माडि- बेसिगॆ ।

बिसिलॊ-ळिट्टॊण — गिसिद-रदु घन- ।

रसव- तुंबलु — बहुदॆ- सर्व स्व — तंत्र- तानॆं-ब ॥ पशुप- नरने — नेनु- माळ्पा- ।

नशन- दान — स्नान- कर्मग- ।

ळॊसरि- पोपवु — बरिदॆ- देहा — यास-वनॆ कॊ-ट्टु ॥ १६-१७ ॥

ऎरडु- दीक्षॆग — ळिहवु- बाह्यां- ।

तरवॆ-निप ना — मदलि- बुधरिं- ।

दरितु- दीक्षित — नागु- दीर्घ — द्वेष-गळ बि-ट्टु ॥

हरियॆ- सर्वो — त्तम क्ष-राक्षर- ।

पुरुष- पूजित — पाद- जन्मा- ।

द्यर वि-दूर सु — खात्म- सर्वग — नॆंदु- स्मरिसुति-रु ॥ १६-१८ ॥

हेय- वस्तुग — ळिल्ल- ऊपा- ।

देय- वस्तुग — ळिल्ल- न्याया- ।

न्याय- धर्मग — ळिल्ल- द्वेषा — सूयॆ- मॊदलि-ल्ल ॥ तायि-तंदॆग — ळिल्ल- कमलद- ।

ळाय-ताक्षगॆ — यॆनलु- ईसुव- ।

कायि-यंददि — मुळुग-गॊडदॆ भ — वाब्धि- दाटिसु-व ॥ १६-१९ ॥

मंद-नादरु — सरियॆ- गोपी- ।

चंद-न श्री — मुद्रॆ-गळ नल- ।

विंद- धरिसुत — श्रीतु-ळसि प — द्माक्ष- सरगळ-नु ॥ कंध-रद म — ध्यदलि- धरिसि मु- ।

कुंद- श्रीभू — रमण- त्रिजग- ।

द्वंद्य- सर्व — स्वामि- मम कुल — दैव-वॆनॆ पॊरॆ-व ॥ १६-२० ॥

प्राय- धन मद — दिंद- जनरिगॆ ।

नाय-क प्रभु — वॆंबि- पूर्वदि ।

ताय- पॊट्टॆयॊ — ळिरलु- प्रभुवॆं — देकॆ- करॆयरॆ-लै ॥ काय- निन्ननु — बिट्टु- पोगलु ।

राय- नीनॆं — बुव प्र-भुत्व प- ।

लाय-नवनै — दितु स-मीपद — लिद्द-रद तो-रु ॥ १६-२१ ॥

वासु-देवै — क प्र-कारदि ।

ईश-नॆनिसुव — ब्रह्म- रुद्र श- ।

चीश- मॊदला — दमर-रॆल्लरु — दास-रॆनिसुव-रु ॥

ई सु-मार्गव — बिट्टु- सॊऽहमु- ।

पास-नॆय गै — व नर- देहज- ।

दैशि-क क्ले — शगळु- बरलव — नेकॆ- बिडिसिकॊ-ळ ॥ १६-२२ ॥

आ प-र ब्र — ह्मनलि- त्रिजग-

द्व्याप-कत्व नि — याम-कत्व ।

स्थाप-कत्व व — शित्व- ईशि — त्वादि- गुणगळि-गॆ ॥ लोप-विल्ले — क प्र-कार स्व- ।

रूप-वॆनिपवु — सर्व- कालदि ।

पोप-वल्लवु — जीव-रिगॆ दा — सत्व-दोपादि ॥ १६-२३ ॥

नित्य- नूतन — निर्वि-कार सु- ।

हृत्त-म प्रण — वस्थ- वर्णो- ।

त्पत्ति- कारण — वाङ्म-नोमय — साम- गानर-त ॥ दत्त- कपिल ह — यास्य- रूपदि ।

पृथ् पृ-थकु जी — वरॊळ-गिद्दु प्र- ।

वर्ति-सुवनव — रवर- योग्यतॆ — कर्म-वनुसरि-सि ॥ १६-२४ ॥

श्रुतिग-ळातन — मातु- विमल- ।

स्मृतिग-ळातन — शिक्षॆ- जीव- ।

प्रतति — प्रकृतिग — ळॆरडु- प्रतिमॆग — ळॆनिसि- कॊळुतिह-वु ॥

इतर- कर्मग — ळॆल्ल- लक्ष्मी- ।

पतिगॆ- पूजॆग — ळॆंदु- स्मरिसुत ।

चतुर- विध पुरु — षार्थ-गळ बे — डदिरु- स्वप्नद-लि ॥ १६-२५ ॥

भूत-ळाधिप — नाज्ञ- धारक- ।

दूत-रिगॆ से — वानु-सारदि ।

वेत-नव कॊ — ट्टवर- संतो — षिसुव- तॆरदं-तॆ ॥ मात-रिश्व — प्रियनु- परम- ।

प्रीति-पूर्वक — सद्गु-णंगळ ।

गाथ-कर सं — तोष- बडिसुव — इह प-रंगळ-लि ॥ १६-२६ ॥

दीप- दिवदलि — कंड-रादडॆ ।

लोप-गैसुव — राक्ष-ण हरि स- ।

मीप-दल्लिरॆ — नंद- नाम सु-नंद-वॆनिसुव-वु ॥ औप-चारिक — वल्ल- सुजनर ।

पाप- कर्मवु — पुण्य-वॆनिपवु ।

पापि-गळ स — त्पुण्य- कर्मवु — पाप-वॆनिसुव-वु ॥ १६-२७ ॥

धनव- संपा — दिसुव- प्रद्रा- ।

वणिक-रंददि — कोवि-दर मनॆ- ।

मनॆग-ळलि सं — चरिसु- शास्त्र — श्रवण-गोसुग-दि ।

मनन- गैदुप — देशि-सुत दु- ।

र्जनर- कूडा — डदिरु- स्वप्नदि ।

प्रणत- कामद — कॊडुव- सौख्यग — ळिह प-रंगळ-लि ॥ १६-२८ ॥

कार-क क्रिय — द्रव्य- विभ्रम ।

मूरु- विध जी — वरिगॆ- बहु सं- ।

सार-किवु का — रणवॆ-निसुववु — ऎल्ल- कालद-लि ॥

दूर- ओडिसि — भ्राम-कत्रय ।

मारि-गॊळगा — गदलॆ- सर्वा- ।

धार-कन चिं — तिसुत-लिरु स — र्वत्र- मरॆयद-लॆ ॥ १६-२९ ॥

करण- कर्मव — माडि-दरॆ वि- ।

स्मरणॆ- कालदि — मातु-गळिगु- ।

त्तरव- कॊडदलॆ — सुम्म-निप्पनु — जाग-राव-स्थॆ ॥ करुणि-सलु व्या — पार- माडुव ।

बरलु- नाल्का — वस्थॆ-गळु परि- ।

हरिसि-कॊळने — तकॆ स्व-तंत्रनु — तानॆ-यॆंबुव-नु ॥ १६-३० ॥

युक्ति- मातुग — ळल्ल- श्रुतिस्मृ- ।

त्युक्त- मातुग — ळिवु वि-चारिसॆ ।

मुक्ति-गिवु सो — पान-वॆनिपवु — प्रति प्र-ती पद-वु ॥

भक्ति- पूर्वक — पठिसु-ववरिगॆ ।

व्यक्ति- कॊडुव स्व — रूप- सुख प्रवि- ।

विक्त-रनु मा — डुवनु- भव भय — दिंद- बहुरू-प ॥ १६-३१ ॥

श्रीनि-वासन — सुगुण- मणिगळ ।

प्राण- मत वयु — नाख्य- सूत्रदि ।

पोणि-सिद मा — लिकॆय- वाङ्मय — नंस-गर्पिसि-दॆ ॥ ज्ञानि-गळ दृ — ग्विषय-वहुद- ।

ज्ञानि-गळिगॆ अ — सह्य- तोर्पुदु ।

माणि-कव म — र्कटन- कैयॊळु — कॊट्ट- तॆरनं-तॆ ॥ १६-३२ ॥

श्रीवि-धीर वि — पाहि-पेश श – ।

चीव-रात्म भ — वार्क- शशि दि- ।

ग्देव- ऋषि गं — धर्व- किन्नर — सिद्ध- साध्य ग-ण ॥ सेवि-त पदां — भोज- तत्पा- ।

दाव-लंबिग — ळाद- भक्तर ।

काव- करुणा — सांद्र- लक्ष्मी — हृत्कु-मुद चं-द्र ॥ १६-३३ ॥

आद-रुशव ग — ताक्ष- भाषा- । भेद-दिंदलि — करॆय-लदनु नि- ।

षेध-गैदव — लोकि-सदॆ बिडु — वरॆ वि-वेकिग-ळु ॥ माध-वन गुण — पेळ्व- प्राकृत- ।

वाद-रॆयु सरि — केळि- परमा- ।

ह्लाद- बडदि — प्परॆ नि-रंतर — बल्ल- कोविद-रु ॥ १६-३४ ॥

भास्क-रन मं — डलव- कंडु न- ।

मस्क-रिसि मो — दिसदॆ- द्वेषदि ।

तस्क-रनु निं — दिसलु- कुंदहु — दे दि-वाकर-गॆ ॥ संस्कृ-तविद — ल्लॆंदु- कुहक ति- ।

रस्क-रिसले — नहुदु- भक्ति पु- ।

रस्क-रदि के — ळ्वरिगॆ- ऒलिवनु — पुष्क-राक्ष स-दा ॥ १६-३५ ॥

पतित-न कपा — लदलि- भागी- ।

रथिय- जलविरॆ — पेय-वॆनिपुदॆ ।

इतर- कवि नि — र्मित कु-काव्या — श्राव्य- बुधरिं-द ॥ कृतिप-ति कथा — न्वितवॆ-निप प्रा- ।

कृतवॆ- ता सं — स्कृतवॆ-निसि स- ।

द्गतिय-नीवुदु — भक्ति- पूर्वक — केळि- पेळ्वरि-गॆ ॥ १६-३६ ॥

वेद- शास्त्र स — युक्ति- ग्रंथग- ।

ळोदि- केळ्दव — नल्ल- संतत ।

साधु-गळ सह — वास- सल्ला — पगळु- मॊदलि-ल्ल ॥

मोद- तीर्था — र्यर म-तानुग- ।

राद-वर करु — णदलि- पेळ्दॆ र- ।

माध-व जग — न्नाथ-विठ्ठल — तिळिसि-ददरॊळ-गॆ ॥ १६-३७ ॥

॥ इति श्री दत्त स्वातंत्र्य (विभजन) सन्धि संपूर्णं ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

॥ श्रीः ॥

Original content reused with permission from Tadipatri Gurukula

॥ भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥