HKS 6. Panchamahaayagnya Sandhi

हरि सर्वोत्तम । वायु जीवोत्तम । श्री गुरुभ्यो नमः ।

*NOTE: Choose desired output script using Aksharamukha (screen top-right).

श्री जगन्नाथदासार्य विरचित श्री हरिकथाम्रुतसर

. पंचमहायज्ञ सन्धि

हरिक-थामृत — सार-गुरुगळ ।

करुण-दिंदा — पनितु-पेळुवॆ ।

परम-भगवद् — भक्त-रिदना — दरदि-केळुवु-दु ॥

जननि- पित भू — वारि-दांबर – ।

वॆनिप- पंचा — ग्नियलि- नारा- ।

यणन- त्रिंशति — मूर्ति-गळ व्या — पार- व्याप्तिग-ळ ॥ नॆनॆदु- दिवसग — ळॆंब- समिधॆग- ।

ळनु नि-रंतर — होमि-सुत पा- ।

वनकॆ- पावन — नॆनिप- परमन — बेडु- परमसु-ख ॥ ६-१ ॥

गगन- पावक — समिधॆ- रवि र- ।

श्मिगळॆ- धूमवु — अर्चि-यॆनिपुदु ।

हगलु- नक्ष — त्रगळु- किडिगळु — चंद्र-मांगा-र ॥ मृगव-रोदर — नॊळगॆ- ऐ रू- ।

पगळ- चिंतिसि — भक्ति-रस मा- ।

तुगळ- मंत्रव — माडि- होमिसु — वरु वि-पश्चित-रु ॥ ६-२ ॥

पाव-कनु प — र्जन्य- समिधॆयु ।

प्राव-ही पति — धूम-गळु मे ।

घाव-ळिगळ — र्चि क्ष-ण प्रभॆ — गर्ज-नवॆ किडि-यु ॥ भावि-सुवुदं — गार- सिडिलॆं- ।

दीवि-धाग्नियॊ — ळब्धि- जातन ।

कोवि-दरु हो — मिसुव-रनुदिन — परम- भकुतिय-लि ॥ ६-३ ॥

धरणि-यॆंबुदॆ — अग्नि- संव- ।

त्सरवॆ- समिधॆ वि — हाय-सवॆ पॊगॆ ।

इरुळु-रि दिशां — गार-वांतर — दिग्व-लय किडि-यु ॥ वरुष-वॆंबा — हुतिग-ळिंदलि ।

हरिय- मॆच्चिसि — सकल-रॊळग ।

ध्वरिय-नागिरु — सर्व- रूपा — त्मकन- चिंतिसु-त ॥ ६-४ ॥

पुरुष- शिखि वा — क्समिधॆ- धूमवु ।

परण-वर्चियु — जिह्वॆ- श्रोत्रग- ।

ळॆरडु- किडिगळु — लोच-नगळं — गार-वॆनिसुव-वु ॥ निरुत- भुंजिसु — वन्न- यदुकुल ।

वरनि- गवदा — नगळु- ऎंदी ।

परि स-मर्पणॆ — गैयॆ- कैकॊं — डनुदि-नदि पॊरॆ-व ॥ ६-५ ॥

मत्तॆ- योषा — ग्नियॊळु- तिळिवुदु- ।

पस्थ- तत्त्ववॆ — समिधॆ- कामो- ।

त्पत्ति- परमा — तुगळॆ- धूमवु — योनि- महद-र्चि ॥ तत्प्र-वेशां — गार- किडिगळु ।

उत्स-हगळु — त्सर्ज-नवु पुरु- ।

षोत्त-मनिगव — दान-वॆनॆ कै — कॊंडु- मन्निसु-व ॥ ६-६ ॥

ऐदु- अग्निग — ळल्लि- मरॆयदॆ ।

ऐदु- रूपा — त्मकन- इप्प- ।

त्तैदु- रूपग — ळनुदि-नदि नॆनॆ — वरिगॆ- जन्मग-ळ ॥ ऐदि-सनु नळि — नाक्ष- रणदॊळु ।

मैदु-नन का — य्दंतॆ- सलहुव ।

बैद-वगॆ गति — यित्त- भयहर — भक्त-वत्सल-नु ॥ ६-७ ॥

पंच-नारी — तुरग-दंददि ।

पंच-रूपा — त्मकनु- ता ष ।

ट्पंच- रूपव — धरिसि- तत्त — न्नाम-दिं करॆ-सि ॥ पंच- पावक — मुखदि- गुणमय ।

पंच-भूता — त्मक श-रीरव ।

पंच-विध जी — वरिगॆ- कॊट्ट — ल्लल्लॆ- रमिसुव-नु ॥ ६-८ ॥

विधि भ-वादि स — मस्त- जीवर ।

हृदय-दॊळगे — कात्म-नॆनिसुव ।

पदुम-नाभनु — अच्यु-तानं — तादि- रूपद-लि ॥

अधि सु-भूता — ध्यात्म- अधिदै- ।

वदॊळु- करॆसुव — प्राण-नागा- ।

भिदनु- दश रू — पदलि- दशविध — प्राण-रॊळगि-द्दु ॥ ६-९ ॥

ईर-यिदु सा — विरद- इप्प- ।

त्तार-धिक मु — न्नूरु- रूपग- ।

ळीरॆ-रडु स्था — नदलि- चिंतिपु — दनुदि-नदि बुध-रु ॥ नूरु- इप्प — त्तेळ-धिक मू -।

रारु- साविर — रूप-दिं दश- ।

मारु-तरॊळि — द्दवर-वर पॆस — रिंद- करॆसुव-नु ॥ ६-१० ॥

चित्त-इसुवुदु — ऎंट-धिक इ- ।

प्पत्तु- साविर — नाल्कु- शत ऐ- ।

वत्तु- मूरु — सुमू-र्तिगळिह — विल्लि- परियं-त ॥

हत्तु- नालकु — रूप-गळ नॆरॆ- ।

बित्त-रवनी — परि ति-ळिदु पुरु- ।

षोत्त-मन स — र्वत्र- पूजॆय — माडु- कॊंडा-डु ॥ ६-११ ॥

ईरॆ-रडु शत — द्व्यष्ट-धिक हदि- ।

नारु- साविर — रूप- सर्व श- ।

रीर-दॊळु श — ब्दादि-गळधि — ष्ठान-दॊळगि-प्प ॥ मारु-तनु ना — गादि- रूपदि ।

मूर-ने गुण — मानि- श्रीदु- ।

र्गा र-मण वि — द्या कु-मोहव — कॊडुव- करण-क्कॆ ॥ ६-१२ ॥

ऐद- विद्यॆग — ळॊळगॆ- इह ना- । गादि-गळधि — ष्ठान-दलि ल- ।

क्ष्मीध-वनु कृ –द्द्धोल्क- मॊदला — दैदु- रूपग-ळ ॥

ता ध-रिसि स — ज्जनर- विद्यव ।

छेदि-सुव ता — मसरि-गज्ञा- ।

नादि-गळ कॊ — ट्टवर-वर सा — धनव- माडिसु-व ॥ ६-१३ ॥

गोवु-गळॊळु — द्गीथ-निह प्र- ।

स्ताव- हिंका — रॆरडु- रूपदि ।

आवि- अजगळॊ — ळिहनु- प्रतिहा — राह्व- हयगळॊ-ळु ॥ जीव-नप्रद — निधन- मनुजरॊ- ।

ळी वि-धदलिह — पंच- सामव ।

झाव-झावकॆ — नॆनॆव-रिगॆ ऐ — दिसनु- जन्मग-ळ ॥ ६-१४ ॥

युग च-तुष्टय — गळलि- तानि- ।

द्युग प्र-वर्तक — धर्म- कर्म ग- ।

ळिगॆ प्र-वर्तक — वासु-देवा — दीरॆ-रडु रू-प ॥

तॆगॆदु- कॊंडु यु — गादि- कृतु ता ।

युग प्र-वर्तक — नॆनिसि- धर्म- ।

प्रघट-कनु ता — नागि- भकुतरि — गीव- संपद-व ॥ ६-१५ ॥

तलॆयॊ-ळिह ना — राय-णनु गं- ।

टलडि- ऒडलॊळु — वासु-देवनु ।

बलद-लिह प्र — द्युम्न- ऎडभा — गदलि- अनिरु-द्ध ॥ कॆळगि-नंगदि — संक-रुषणन ।

तिळिदु- ई परि — सकल- देहग ।

ळॊळगॆ- पंचा — त्मकन- रूपव — नोडु- कॊंडा-डु ॥ ६-१६ ॥

तनु वि-शिष्टदि — इप्प- नारा ।

Yअणनु- कटि पा — दांत- संकरु- ।

षणनु- शिर जघ — नांत-वागिह — वासु-देवा-ख्य ॥ अनिमि-षेशनि — रुद्ध- प्रद्यु- ।

म्ननु ऎ-डदि बल — भाग-दलि चिं- ।

तनॆय- माळ्परि — गुंटॆ- मैलिगॆ — विधि नि-षेधग-ळु ॥ ६-१७ ॥

पदुम-नाभनु — पाणि-यॊळगिह ।

वदन-दलि हृषि — केश- नासिक- ।

सदन-दलि श्री — धरनु- जिह्वॆयॊ — ळिप्प- वामन-नु ॥ मृदुल- त्वग्दे — शदि त्रि-विक्रम ।

मधु वि-रोधियु — लोच-नदि क- ।

र्णदलि- इप्पनु — विष्णु- नामक — श्रवण-नॆंदॆनि-सि ॥ ६-१८ ॥

मनदॊ-ळिह गो — विंद- माधव ।

धनप-सख त — त्वदॊळु- नारा- ।

यण म-हत्त — त्वदॊळु- अव्य — क्तदॊळु- केशव-नु ॥ इनितु- रूपव — देह-दॊळु चिं- ।

तनॆय- गैव म — हात्म-रिळॆयॊळु ।

मनुज-रवर — ल्लमर-रे सरि — हरि कृ-पाबल-दि ॥ ६-१९ ॥

नॆलदॊ-ळिप्पनु — कृष्ण-रूपदि ।

जलदॊ-ळिप्पनु — हरियॆ-निसि शिखि- ।

यॊळगॆ- इप्पनु — परशु-राम उ — पेंद्र-नॆंदॆनि-सि ॥ यलरॊ-ळिप्पज — नार्द-ननु बां- ।

दळदॊ-ळच्युत — गंध- नरहरि ।

पॊळॆव-धोक्षज — रसग-ळॊळु रस — रूप- ताना-गि ॥ ६-२० ॥

रूप- पुरुषो — त्तमनु- स्पर्श- ।

प्राप-कनु अनि — रुद्ध- शब्ददि ।

व्यापि-सिह प्र — द्युम्नु-पस्थदि — वासु-देवनि-ह ॥

ता पॊ-ळॆव पा — युस्थ-नागि ज- ।

याप-तियु सं — करुष-णनु सु- ।

स्थाप-कनॆनिसि — पाद-दॊळु दा — मोद-रनु पॊळॆ-व ॥ ६-२१ ॥

चतुर-विंशति — तत्त्व-दॊळु श्री- ।

पतियु- अनिरु — द्धादि- रूपदि ।

वितत-नागि — द्दखिल- जीवर — संह-ननदॊळ-गॆ ॥ प्रतति-यंददि — सुत्ति सुत्तुत ।

पितृग-ळिगॆ त — र्पकनॆ-निसिकॊं- ।

डतुळ- महिमनु — षण्ण-वति ना — मदलि- नॆलॆसिह-नु ॥ ६-२२ ॥

चतुर-विंशति — तत्त्व-दॊळु त- ।

त्पतिग-ळॆनिसुव — ब्रह्म-मुख दे- ।

वतॆग-ळॊळु ह — न्नॊंदु- नूरै — वत्तॆ-रडु रू-प ॥ वितत-नागि — द्दॆल्ल- जीवर ।

जतन- माडुव — गोसु-ग जग- ।

त्पतिगॆ- एना — दरु प्र-योजन — विल्ल- विदरिं-द ॥ ६-२३ ॥

इंदि-राधव — शक्ति- मॊदला- ।

दॊंद-धिक दश — रूप-दिंदलि ।

पॊंदि-हनु सक — लेंद्रि-यगळलि — पुरुष- नामक-नु ॥ सुंद-रप्रद — पूर्ण- ज्ञाना- ।

नंद-मय चि — द्देह-दॊळु ता ।

ऒंद-रक्षण — वगल-दलॆ पर — माप्त-नागि-प्प ॥ ६-२४ ॥

आर-धिक दश — रूप-दिंदलि ।

तोरु-तिप्पनु — विश्व- लिंगश- ।

रीर-दॊळु तै — जसनु- प्राज्ञनु — तुर्य- नामक-नु ॥ मूर-यिदु रू — पंग-ळिंदलि ।

ईर-यिदु कर — णदॊळु- मात्रदि ।

खेर- शिखि जल — भूमि-यॊळगिह — आत्म- नामद-लि ॥ ६-२५ ॥

मनदॊ-ळगहं — कार-दॊळु चिं- ।

तनॆय- माळ्पुदु — अंत-रात्मन ।

घन सु-तत्त्वदि — परम-नव्य — क्तदलि- ज्ञाना-त्मा ॥ इनितु- पंचा — शद्व-रण वे- ।

द्यन अ-जाद्यै — वत्तु- मूर्तिग- ।

ळनु स-दा स — र्वत्र- देहग — ळल्लि- पूजिपु-दु ॥ ६-२६ ॥

चतुर-विंशति — तत्त्व-दॊळु त- ।

त्पतिग-ळॆनिसुव — ब्रह्म-मुख दे- ।

वतॆग-ळॊळु हदि — मूरु- साविर — दॆंटु- नूरधि-क ॥ चतुर-विंशति — रूप-दिंदलि ।

वितत-नागि — द्दॆल्ल-रॊळु प्रा- ।

कृत पु-रुषनं — ददलि- पंचा — त्मकनु- रमिसुव-नु ॥ ६-२७ ॥

केश-वादि सु — मूर्ति- द्वादश- ।

मास- पुंड्रग — ळल्लि वेद- ।

व्यास- अनिरु — द्धादि- रूपग — ळारु- ऋतुगळ-लि ॥ वास-वागिह — वॆंदु- त्रिंशति- ।

वास-रदि स — त्कर्म- धर्म नि- ।

राशॆ-यिंदलि — माडु- करुणव — बेडु- कॊंडा-डु ॥ ६-२८ ॥

लोष्ट- कांचन — लोह- शैलज- ।

काष्ठ- मॊदला — दखिल- जड पर- ।

मेष्ठि- मॊदला — दखिल- चेतन — रॊळगॆ- अनुदिन-वु ॥ चेष्टॆ-गळ मा — डिसुत- तिळिसदॆ ।

प्रेष्ठ-नागि — द्दॆल्ल-रिगॆ स- ।

र्वेष्ट-दायक — संत-यिसुवनु — सर्व-जीवर-नु ॥ ६-२९ ॥

वासु-देवनि — रुद्ध- रूपदि ।

पुं श-रीरदॊ — ळिहनु- सर्वद ।

स्त्रीश-रीरदॊ — ळिहनु- संक — र्षणनु- प्रद्यु-म्न ॥ द्वासु-पर्णा — शृतिवि-नुत स- ।

र्वा सु-निलय न — राय-णन सदु ।

पास-नॆय गै — ववरु- जीव — न्मुक्त-रॆनिसुव-रु ॥ ६-३० ॥

तन्न-नंता — नंत- रूप हि- ।

रण्य- गर्भा — दिगळॊ-ळगॆ का- ।

रुण्य- सागर — हरहि- अवरव — रखिल- व्यापा-र ॥ बन्न- बडदलॆ — माडि- माडिसि ।

धन्य-रॆनिसि स — मस्त- दिविजर ।

पुण्य- कर्मव — स्वीक-रिसि सुख — वित्तु- पालिसु-व ॥ ६-३१ ॥

साग-रदॊळिह — नदिय- जल भे- ।

दाग-सदॊळि — प्पब्द- बल्लवु ।

कागॆ- गुब्बिग — ळरिय- बल्लवॆ — नदिय- जलस्थिति-य ॥ भोगि-वर परि — यंक- शयननॊ- ।

ळी गु-णत्रय — बद्ध- जगविहु- ।

दाग-मज्ञरु — तिळिव-रज्ञा — निगळि-गळवड-दु ॥ ६-३२ ॥

करण- गुण भू — तगळॊ-ळगॆ त- ।

द्वररॆ-निप ब्र — ह्मादि- दिविजरॊ- ।

ळरितु- रूप च — तुष्ट-यगळनु — दिनदि- सर्व-त्र । स्मरिसु-तनुमो — दिसुत- हिग्गुत ।

परव-शदि पा — डुवव-रिगॆ त- ।

न्निरव- तोरिसि — भव वि-मुक्तर — माडि- पोषिसु-व ॥ ६-३३ ॥

मूल- रूपनु — मनदॊ-ळिह श्रव- ।

णालि-यॊळगिह — मत्स्य- कूर्मनु ।

कोल-रूपनु — त्वग्र-सनदॊळ — गिप्प- नरसिं-ह ॥ बाल-वटु वा — मननु- नासिक- ।

नाळ-दॊळु वद — नदलि- भार्गव ।

वालि- भंजन — हस्त-दलि पा — ददलि- श्रीकृ-ष्ण ॥ ६-३४ ॥

जिन वि-मोहक — बुद्ध- पायुग ।

दनुज- भंजन — कल्कि- मेढ्रदि ।

इनितु- दश रू — पगळ- दश कर — णंग-ळलि तिळि-दु । अनुभ-विप विष — यगळ- कृष्णा- ।

र्पणवॆ-नलु कै — कॊंब- वृजिना- ।

र्दन व-र जग — न्नाथ-विठ्ठल — विश्व- व्यापक-नु ॥ ६-३५ ॥

॥ इति श्री पंचमहायज्ञ सन्धि संपूर्णं ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

। श्रीः ॥

Original content reused with permission from Tadipatri Gurukula

॥ भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥